प्रकाशन का समय : सुबह
एलएसी पार इंफ्रास्ट्रक्चर रेस चल रही है
भारत और चीन दोनों अपनी सीमा पर बहुत तेजी से निर्माण कर रहे हैं, जिसे हम वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) कहते हैं। ये बॉर्डर 3,488 किलोमीटर लंबा है और दोनों तरफ से विवाद में है। भारत ने चीन की प्रगति का मुकाबला करने के लिए बहुत बड़ी परियोजनाएं शुरू की हैं। जैसे कि सितंबर 2025 में अरुणाचल फ्रंटियर हाईवे का काम शुरू हुआ – ये 1,840 किमी की सड़क है जो एलएसी के बिल्कुल पास से गुजरती है। इसे सैनिक और आपूर्ति जल्दी पाहुंच सकते हैं। चीन ने भी तिब्बत में सड़कें, हवाई क्षेत्र और रेलवे को बढ़ाया है। दोनों देशों के अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को सुपर-फास्ट बना रहे हैं, खास कर 2020 के गलवान संघर्ष के बाद।

भारत ने अब तक 90 से अधिक महत्वपूर्ण परियोजनाएं पूरी कर दी हैं, जिनकी कुल लागत 2,900 करोड़ रुपये है। ये परियोजनाएं 11 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हैं – पुल, सड़कें, सुरंगें सब कुछ। सेना को तेज गति से चलने और भारी उपकरण ले जाने में मदद मिलती है। लद्दाख में 55,000 सैनिकों के लिए नए आवास और 400 बंदूकों के भंडारण के लिए 1,300 करोड़ का प्रोजेक्ट भी चल रहा है। चीन भी G-219 और G-695 जैसे हाईवे बना रहा है बॉर्डर के पास। ये सब देख कर लगता है कि दोनो तरफ फुल स्पीड में रेस चल रही है।
सीमा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए नई चौकियाँ
चीन को जवाब देने के लिए भारत भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के लिए नई चौकियां बना रहा है। अब आईटीबीपी के 215 फॉरवर्ड पोस्ट हैं, पहले सिर्फ 180 थे। जल्दी ही 41 और बेस बनने वाले हैं, जिनमें से 10 पोस्ट सिर्फ महिला जवानों के लिए होंगी। ये ऊंचाई वाले इलाकों में सुरक्षा और पहुंच बढ़ती है। आईटीबीपी वही बॉर्डर गार्ड करती है जो बहुत ठंड और सख्त होता है। नई बटालियनें और मुख्यालय भी बन रहे हैं ताकि निगरानी बेहतर हो।
भारत ने लद्दाख, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में 1,20,000 सैनिकों को स्थायी रूप से तैनात कर रखा है। ये चीन की सेनाएं बराबर हैं, वो भी 10,000 फीट से ज्यादा ऊंचाई पर हैं। गलवान झड़प के बाद से ये तैनाती स्थायी हो गई है। 2020 में गलवान में सैनिकों के बीच झड़प हुई थी। 2024 तक डोनो तरफ से थोड़ी सेना वापसी हुई, लेकिन टेंशन अब भी फुल है। अगस्त 2025 में नई दिल्ली में बातचीत जारी है, लेकिन छोटी-छोटी झड़पें 2025 में भी हो सकती हैं।
चीन के यारलुंग त्सांगपो डैम से पानी का दर
सबसे बड़ा तनाव का कारण है चीन का नया मेगा बांध यारलुंग त्संगपो नदी पर (जो भारत में ब्रह्मपुत्र के नाम से जाना जाता है)। 2025 में बांध का काम शुरू हुआ, लागत लगभाग 170 अरब डॉलर है। ये मेटोग काउंटी में है और दुनिया का सबसे बड़ा जलविद्युत प्रोजेक्ट बनेगा – बिजली उत्पादन थ्री गोरजेस डैम से तीन गुणा ज्यादा होगी। भारत को डर है कि चीन पानी को नियंत्रित करके निचले इलाकों को नुक्सान पहुंचा सकता है।
ये नदी भारत और बांग्लादेश में 13 करोड़ से ज्यादा लोगों को पानी देता है। चीन कहता है ये आपदा नियंत्रण और जलवायु के लिए मददगार है, लेकिन भारत पर भरोसा नहीं है। चीन के काई पनबिजली परियोजनाओं से उनको जल का लाभ मिलता है। भारत भी अरुणाचल प्रदेश में 3.9 बिलियन डॉलर का अपना प्लांट बना रहा है बॉर्डर के पास। ये प्रतियोगिता और भी बहुत बढ़िया है।
चुनौतियाँ अब भी बहुत हैं और आगे क्या?
2017 का डोकलाम और 2020 का गलवान टकराव के बाद तनाव बहुत बढ़ गया। चीन अरुणाचल प्रदेश को ज़ंगनान कहते हैं। दोनों देशों में अपनी ताकत दिखाने के लिए बुनियादी ढांचे और सैनिक बढ़ रहे हैं। भारत ने डीएसडीबीओ रोड जैसी परियोजनाओं को अपग्रेड किया है ताकि टैंक और मिसाइलें आसान से आगे बढ़ सकें। 2025 के पेंटागन रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन का शांत सिर्फ सामरिक है, असली बदलाव नहीं आया। शांति वार्ता चल रही है, लेकिन बुनियादी ढांचे की दौड़ और सीमा पर स्थायी सैनिकों की दौड़ अब भी गर्म है। दोनो तरफ को ज्यादा बात करनी पड़ेगी ताकि कोई बड़ा क्लैश न हो।
खुशालाल प्रजापति द्वार लिखा गया।
स्वतंत्र समाचार प्रकाशक जो वैश्विक मामलों, आपूर्ति श्रृंखलाओं और सार्वजनिक नीति पर ध्यान केंद्रित करता है – और सब कुछ सत्यापित रिपोर्टिंग के साथ!






Leave a Reply